नमस्ते.....
"स्वदेशी" भावना / विचार अत्यंत महत्व पूर्ण हे ! केवल महत्व पूर्ण नहीं , इस विचार अर्थ पूर्ण भी हें ! मेरा सोचना हे येह की, "स्वदेशी" केवल विचारों में नहीं, हमारे आचार में भी होने की आवश्यकता हें !! अगर कोई विचार , व्यक्ती के आचार में होना हें तो, सभसे पेहले उस विचार पर उनकी श्रद्धा होना चाहिएं,
(जैसें हमें हमारे जीवन पर जितनी श्रद्धा होती हे के इसलिए हम जीवन में कुछ साधन करने के लिए बहुत प्रयास करतें हें !! और प्रयास करते करते, हम कभी कभी सामाजिक विचारों पर चिंतन करने भूल जातें हें) !!
मुझे लगा की हम इस "स्वदेशी" विचार को अभ "राष्ट्र" के आर्थिक दृष्टि से देखें, सोचें और चिंतन करें की इस विचार के आधार पर हमारा "भारत" की आर्थिक उन्नती होने की संभावना हें की..... ?? !!
यहां हें मेरा अभिप्राय :
इस दुनियाँ में लगभग 153 के आआस पास प्रत्येक राष्ट्र हें , और उन सभ राष्ट्रों का प्रत्येक रीति की अर्थ -व्यवस्था होती हें , और इसी व्यवस्था के आधार में हर राष्ट्र का आर्थिक-उन्नती भी होती हें !!
इस चर्चे के लिए में "छीना" देश की व्यापार नीति / अर्थ- व्यवस्था के उदाहरण लेना चाहता हूँ.
में अभी "कनाडा"(Canada) देश में वासीत हूँ ("तात्कालिक"). यहाँ में जब जब किसी बड़े बड़े दुकान (shopping mall) को जाता हूँ, मे ध्यान से देखने की कोशिश करता हूँ की :
1) उन दुकान(shopping mall)की हर तरह की चीज़, हर तरह की वस्तु, कौंसी "देश" से उत्पाधान होता हें ??.... इस वस्तुओं का सृष्टि किस "देश" में हुई ??
2) इस वस्तु को अगर कोई ख़रीधा तो, उसका मुनाफ़ा किस "देश" को ज़्यादा होती
हें ??.... इससे किस "देश" का आर्थिक स्थिति बड़ेगा ??
ये देखने में , मुझे हर वस्तु में सिर्फ़ "छीना" देश की वस्तु हीं दिखरहा था !!
जिन वस्तुओं, जिन चीज़ों बहुत सस्ता थे , उन सभ सिर्फ़ "छीना-देश" के थे. तब में चिंतन करने लगा की "छीना" देश कितने वस्तुओं को उत्पाधान करतें हें की,
वहाँ (छीना में) उत्पाधान होते हर वस्तु दुनियाँ के "बहुत सी देशों" में चालित होती हें, हर देश में भेजतें चीनी लोग.
और इस समय हुमें ध्यान रखना हें की "चीनी" के अर्थ-व्यवस्था इस लिए बहुत उँची बाद रहान हें !! "छीना" देश ज़ोर से आगे बद रहान हें !!....
मुझे येह मान ना हें की "छीना देश" में उसी देश का बहुत सारा छोटी छोटी उत्पाधान करने का ताना (small-scale factories) होता हें, इस लिएन वोह लोग आगे बहुत तेज़ से बाद रहान हें !!
पर "भारत" के वस्तु मुझे नहीं दिखा देती हें ,
"विदेश में तो छोड़ीयेन, स्वदेश में भी स्वदेशी वस्तु नई देख सकतें हें "
"दाँत-मानजन".... से लेके "चंधन" तक "लेखनी" से लेकर... हर चीज़ में "
विदेश की वस्तु हीं "भारत" में चलती हें !!
अभ हमें सोचना हें की ,
हमारा देश कैसे बड़ेगा ?? "हमारा भारत" कैसे शक्तिवांत होगा "आर्थिक-दृष्टि" से.....?????
हमारे हिंदुस्तान को आर्थिक शक्तिशाली राष्ट्र बनाना , इस राष्ट्र के "प्रज़ें" होते हुए , इस ढायित्व को हमें हीं पूरा करने पड़ेगा ना??
इस लिए क्यों ना हम "स्वदेशी" विचार को एक जीवंत दृष्टि दें ??
क्यों ना हम इस विचार का आचार करने की कोशिश करें ??
मुझे ये मानना हें की हर चीज़ में "भारत" का उत्पाधान "छीना देश" की तरह महत्वा पूर्ण पात्र होना चाहिएं !!.... येह पुरी होगा जब हम सब साथ मिलके, पेहले व्यक्तिगत निश्चय करें की
"स्वदेशी हमारा आध्यता होगा" !! ईसस से "भारत" का "आर्थिक-व्यवस्था" उँचे बाद जाएँ !!.... बाढ़ में हम भी "GLOBALISATION".... को स्वीकार करने में फल होता हें !!.... उसके बाढ़ हम भी "OPEN-MARKET" के विचार स्वीकार करने में देश की भलाई होती हें !!....
इस विषय को क्यूं ना हम हमारे "मन में और "दुसरों भारतीयों के मन में एक विचार करने का प्रयास दें ???
यही मेरा येह पत्र का उद्देश था !! "स्वदेशी विचार को जै हो"
आपका विचार को, आपका चर्चा को में स्वागत करता हूँ !!
"Be Indian Buy Indian"
Vande Maatharam
आपका
श्रीनिवासा रंगन
**शुभम !!**
Bhaarath Maata
Than se.. Mann se.. Dhan se.. Hum Karen Raashtr Aaraadhan
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2 comments:
Namaste Cheena ,
My aapki baath per sahamth hoon , pichele mail me main aapse yahi vichar per mera abhipraya vinimay kiya ta .. ab bhi vahi bol raha hoon hum sab swayam sevak ese ek andolana jaise svikar kare. aur hum pahle swadeshi vastu ka UPAYOG aacharan me laye . hum dhire dhire se yeh karna hi ... kyonki kuch bhi badalavan achanak nahi hoti .. hum dhire dhire se es vichara ka palan karna chayiye . yadi hum aise karenge to tab to ek din nichya se "BHARATH SHAKTHISHALI RASHTRA BANEGA "
ITI AAPKA PRIYA
RAMA
VANDE MATARAM
BHARATH MATA KI JAI
Do you have an English (or Kannada) version of this article?
-Narendra
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